Sunday, February 10, 2019
Wednesday, May 7, 2014
विकल्प
पत्नी ने लगभग चीखते हुए कहा था। प्रकाश सन्न रह गया। इस से पहले वो कुछ बोल पाता। पत्नी ने फोन काट दिया। रात के साढ़े ११ बज रहे थे। रूममेट सो चुके थे, लेकिन प्रकाश की आंखों से नींद गायब थी। बार-बार पत्नी के कह गए कर्कश शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे। सारी रात उसने करवटें बदल कर गुजारी। अपने को ही कोषता रहा। सुबह भी उसका मन नहीं लगा। नित्यकर्म से निबट कर तैयार होकर ऑफिस आ गया। पर काम में मन कहां लगाना था। उसने ऑफिस के फोन से ही पत्नी को फोन लगाया। हालांकि वो गलत नहीं था, लेकिन फिर भी उसने पत्नी से माफी मांगी। पत्नी टस से मस नहीं हुई। प्रकाश निराश हो गया। यह निराशा उसे अवसाद के भंवर में डूबोती चली गई।
प्रकाश व कविता की शादी को अभी कुछ माह ही हुए थे। साल पूरा होने में दो महीने बाकी थे। हालांकि दोनों आपस में प्रेम करते थे। परिवार के लोगों ने यह जाना तो उन्होंने विरोध किया, लेकिन दोनों की दृढ़ता व एक दूसरे में विश्वास देखकर पैर पीछे ले लिए। प्रेम को 'अरेंजÓ कर लिया गया। दोनों परिवारों की असहमत रजामंदी से हुई शादी से युगल के अलावा कोई खुश नहीं था।
प्रकाश को शादी के लिए खासे पापड़ बेलने पड़े थे।
दिल्ली के एक प्रतिष्ठित जनसंचार महाविद्यालय से पढ़ाई के दौरान उसका परिचय कविता से हुआ था। जो बाद में प्रेम में परिवर्तित हो गया। कोर्स खत्म होने के बाद उसने रोजगार की तलाश शुरू कर दी थी। गुजरात की एक एनजीओ के साथ उसने काम शुरू किया, लेकिन वेतन ढग़ का नहीं मिलने से कुछ समय बाद उसने मध्यप्रदेश के एक प्रतिष्ठित अखबार के इंदौर संस्करण में नौकरी कर ली। यह नौकरी पिछली से बेहतर थी वा वेतन भी अच्छा था, लेकिन इतना नहीं की वो अपनी गृहस्थी शुरू कर सके। यहां से भी जल्द उसका मन उचट गया। काफी दिनों तक बेरोजगार रहा। काफी हाथ पांव मारने के बाद उसे फिर से उत्तरप्रदेश के एक मीडिया हाउस के इलाहाबाद संस्करण में नौकरी मिल गई। इलाहाबाद व घर रायबरेली में ज्यादा फासला नहीं था। इसलिए उसको यह नौकरी पसंद आई। इलाहाबाद में ही उसने कुछ परिचितों के साथ किराए का कमरा ले लिया। रोजगार में स्थायित्व आने के बाद उसने कविता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। परिवार वालों की थोड़ी ना नुकुर के बाद शादी भी हो गई, लेकिन नियती को युगल की खुशी मंजूर नहीं थी।
प्रकाश काम व परिवार में संतुलन बनाने की खूब कोशिश कर रहा था। वह तेजतर्रार पत्रकार था। किसी बड़े घोटाले के उसे सुराग मिले थे, जिसकी चर्चा उसने अपने संपादकीय सहयोगियों से की थी। वह इसे खुलासे के लिए जरूरी तथ्य व दस्तावेज जुटाने में दिन रात लगा था। इधर, जैसा लव कम अरेंज शादियों में होता है। परिवार के लोग खुश नहीं थे। प्रकाश की काम में व्यस्तता व कम आय को ससुराल के लोग ने मुद्दा बना लिया था। वे कविता को भरते। वहीं कविता को सास-ससुर का अपेक्षित स्नेह व सहयोग नहीं मिल रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि कविता ने प्रकाश को बात बेबात ताने देने शुरू कर दिए थे। वो उसे अलग रहने के लिए मजबूर करती थी।
एक बार कविता ने फोन पर कह ही दिया-
'मुझे साथ नहीं रख सकते तो शादी क्यों कीÓ
' थोड़ा सब्र करो, मैं कोशिश कर रहा हूं। जल्द ही मैं तुम्हे इलाबाद बुला लूंगा।Ó
'हूं...। यह मैं कितने दिनों से सुन रही हूं। हर बार तुम बहाने बनाते हो।Ó
हालांकि नौकरी से प्रकाश को वेतन अच्छा मिल रहा था, लेकिन वह इतना पर्याप्त नहीं था कि एकाएक अलग गृहस्थी शुरू की जा सके। वह यह बात कविता को समझाता, लेकिन कविता नहीं मानती। धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों पर बहस हो जाना आम बात होने लगी थी। कविता के ताने प्रकाश को परेशान करते पर वो सह जाता। अपने मां-बाप को सास-सुसर को समझाता, लेकिन वे कहते 'शादी अपनी पसंद से की है अब झेलो...।Ó वह सब में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता।
इधर, कार्यालय में भी उसके लिए सबकुछ ठीक नहीं था। काम का भारी दबाव था। सुबह दस बजे ऑफिस जाता तो रात के आठ नौ बजे तक रूम पर वापस आ पाता कभी-कभी १० या ११ भी बज जाते। अखबार की नौकरी ने उसकी सामाजिक जिंदगी को खत्म ही कर दिया था। बिगड़ता वैवाहिक जीवन व काम का दबाब ने उसकी सोचने-समझने व तर्क शक्ति को कुंद कर दिया था। वो प्रकाश जो कॉलेज के जमाने में सभी की जान हुआ करता था, जिसके हंसमुख मिजाज कर हर कोई कायल था। आज वो कुम्भला सा गया था, लेकिन फिर भी वो जी रहा था।
आखिर वो मनहूस रात भी आ गई। कविता को किसी बात पर उसकी सास ने डांट दिया। दोनों में तू-तू, मैं-मैं हो गई। कविता ने रात के साढ़े ११ बजे ही प्रकाश को फोन कर दिया। प्रकाश बस थोड़ी देर पहले ही कमरे पर आया था। खाना खाकर बैठा ही था। कविता ने शिकायतें शुरू कीं। प्रकाश उसे समझाता रहा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उलाहनों से उसके भी सब्र का बांध टूट गया। वो भी विफर पड़ा। फिर क्या था।
कविता ने बोल दिया-'मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना।Ó प्रकाश ने अगले दिन सुबह भी पत्नी से फोन पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी। प्रकाश ने संपादक को छुट्टी की अर्जी दी। किसी से कुछ बोले बिना ही रूम पर आया। सामान पैक किया और घर (रायबरेली) के लिए निकल पड़ा। घर पहुंचते ही उसे पत्नी व माता-पिता की एक दुसरे को लेकर शिकातें सुनने को मिलीं। उसने सब को समझाया, लेकिन एक भी नहीं माना।
प्रकाश इतना परेशान हो गया कि रोने लगा। फिर भी किसी का दिल नहीं पसीजा। निराश व उदास अपने कमरे में आया और बिस्तर पर औंधे मुंह लेट गया। वह कुछ सोच नहीं पा रहा था। समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था। प्रकाश को एक एक कर पत्नी, मां-बाप, सास-ससुर, संपादक, सहकर्मी सब की चौं-चौं ही सुनाई दे रही थी। उसके कान बहरे हुए जा रहे थे। दिमाग की नसें फटी जा रही थीं। आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था। इन सब से मुक्ति का उसे सिर्फ एक ही विकल्प नजर आया।
'आत्महत्या...Ó।
दूसरे दिन प्रकाश का शव उसके कमरे में फंखे से झूलते मिला।
लेखक- अरुण कुमार वर्मा, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। वर्तमान में राजस्थान पत्रिका में कार्यर्त हैं।
(नोट- आत्महत्या विकल्प नहीं है। यह कायरों का काम है। हालातों से लडऩा चाहिए। काश काहानी के पात्र प्रकाश ने भी लड़ाई लड़ी होती तो इतना होनहार पत्रकार समाज को कितना कुछ दे पाता।
यह कहानी काल्पनिक है। जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर नाम या अन्य कोई चीज मेल खाती है तो यह महज संयोग समझा जाए।)
Friday, November 15, 2013
मेरी दुलारी सत्वा है।
खूब हंसाती और सताती
मन की रानी सत्वा है।
खुद खाएगी, खुद गायगी,
मन होगा तो बतलायगी,
नखरों से भी नखराली
मेरी प्यारी सत्वा है।
ममा के मन को भाती है,
पापा से हिलमिल जाती है।
दादा-दादी, नाना-नानी की,
आंखों का तारा है।
मामा के शब्दों में आती,
अपना प्यार खूब लुटाती
सब की प्रतिकृति सत्वा है।
सत्वा अब स्कूल जाएगी,
ज्ञान पाएगी, मान पाएगी।
खूब पढ़ेगी, खूब बढ़ेगी,
आवाम की आवाज बनेगी।
सत्वा अब, आगे बढ़ सबको,
सच की राह दिखाएगी,
'सत्यÓ नाम को सार्थक कर
सबका मान बढ़ाऐगी।
मेरी प्यारी भांजी का समर्पित। सत्वा खूब पढ़ो, संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाओ। मजलूमों की आवाज बनो और दुखियों का सहारा। बढ़े होकर कुछ ऐसा काम करना कि माता-पिता और पूरे परिवार को तुम पर गर्व हो। समाज कहे तुम उसकी प्यारी बेटी हो। तुम अभी तो शायद इन शब्दों के अर्थ नहीं समझ पावो, लेकिन एक दिन आएगा जब तुम इन शब्दों को जीवोगी। मेरा ढेर सारा आशीष। उत्तरोत्तर प्रगति करो।
अरुण कुमार वर्मा, तुम्हारा प्यारा मामा।
Thursday, April 18, 2013
भारतीय जन संचार संस्थान में दाखिला लेने के दौरान ही यह रहस्योद्घाटन हुआ कि संस्थान परिसर में लड़कों के लिए 'छात्रावासÓ की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जबकि लड़कियों के लिए है। हालांकि थोड़ा बुरा लगा, लेकिन... फिर यह पता चला कि परिसर में लड़कों के लिए छात्रावास निर्माणाधीन है। थोड़ा संतोष मिला। खैर... कमरा खोजने की लड़ाई यहां से शुरू हुई। तब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मेरे विद्यालय के समय के सीनियर एमसीए में अध्ययनर्त थे। हालांकि खास परिचय नहीं था, लेकिन दूसरे सीनियर की मार्फत उनका पता मिला। फोन से सम्पर्क कर उनके छात्रावास पहुंचा (हॉस्टल का नाम भूल गया हूं)। मोआज्जम नाम है उनका। बड़े सहयोगी व उदार थे। दो दिन उनके ही यहां पड़ाव डाला। उन्हीं से पहले पहल बेर सराय की जानकारी मिली। यह भी पता चला की वहां कम किराए में कमरा मिल जाएगा। उम्मीद थी कि वह भी साथ चलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो व्यस्त थे।
मैं अकेले ही रूम की तलाश में निकल पड़ा। जेएनयू के गेट से बाहर बेर सराय की ओर जाते हुए मन में बार-बार विचार आया कि मोअज्जम भी साथ होते। कैसे कमरा खोजूंगा, कैसे बात होगी, कैसा माहौल होगा। बस... यही सोचता चलता चला गया। बेर सराय बस स्टॉप पर पहुंच कर थोड़ा ठिठका। अंदर की ओर जाती एक गली दिखाई पड़ी। बस उसी ओर चल पड़ा। उस संकरी से गली में आगे बढ़ता रहा। बड़ा अजीब सा माहौल था। एक मुख्य बड़ी गली के बाद कई छोटी-छोटी गलियां, ऊपर कई मंजिल मकान। कहीं-कहीं ऊपर से गिरता पानी, जमीन पर फैल गया था। तेज कदमों से आते-जाते लोग पानी की गिरती धार से बचते आगे बढ़ रहे थे। कुछ युवा बेतकुल्फी से चहल-कदमी करते चले आ रहे थे। आस-पास की दीवारों पर 'टू लेटÓ व कोचिंग संस्थानों के असंख्य विज्ञापन थे। दीवारों से झांकती स्टेशनरी, मोबाइल रिचार्ज, खाने-पीने की दुकानें। लखनऊ के पुराने 'अमीनाबादÓ जैसा ही नजारा था। काफी देर तक यहां-वहां घूमने के बाद मैंने कुछ स्थानीय से दिखते लोगों से कमरे के लिए पूछा। एक प्रेस वाले ने पास में ही एक खाली कमरे की जानकारी दी। वहां गया तो एक जाट भाई ( उनका नाम कुक्कू था) हाल में बने कमरे की तराई करने में व्यस्त थे। उनसे कमरे की बात हुई। कुक्कू बोले 'सात दिन में कमरा पूरी तरह से तैयार हो जाएगा।Ó
मैंने अंदर जाकर रूम देखा। वह लगभग १० गुणा १० का छोटा कमरा था, जिसमें अलग से बाथरूम, टॉयलेट व उससे सटता छोटा सा किचन था। कमरा पसंद आया या यूं कहने उससे सस्ता कमरा वहां पर नहीं था। हां... कहना पड़ा। किराया ३२ सौ रुपए तय हुआ। अग्रिम १ हजार रुपए देकर मैं वापस जेएनयू हॉस्टल आ गया। मोअज्जम को कमरा मिलने की बात बताई। इस दौरान कपिल ( आईईएमसी मेरे सहपाठी ) को फोन पर कमरा मिलने की सूचना दी। उनके पिता जी से कमरे के संबंध में बात हुई।
यहां से मैं वापस मुखर्जी नगर अपने एक सीनियर के पास चला गया। तय दिन मैं अपना बैग, एक गुदड़ी व चद्दर लेकर बेर सराय के रूम में पहुंच गया। दो दिन अकेले ही रहा। तीसरे दिन कपिल भी आ गया। अब हम दोनों उस छोटे से कमरे में रह कम एडजेस्ट ज्यादा कर रहे थे। दो बड़े मकानों के गलियारे में हमारे रूम का दरवाजा खुलता था। सीलन भरे कमरे में रोशनी का कोई नामोनिशान नहीं था। एक अजीब से गंध हमेशा आती रहती थी। गलियारे के प्रवेश द्वारा पर कोई गेट नहीं था, इसलिए आवारा कुत्ते अंदर तक चले आते। कई बार तो वो दरवाजा खुला होने पर हमारे कमरे तक में प्रवेश कर गए थे। बाहर ही जीनों के पास पानी खींचने के लिए मोटर लगा रखी थी। जब वह चलती तो वहां ढेर सा पानी फैला जाता, जिससे गलियारा हमेशा गीला बना रहता।
कहने को तो मैं दिल्ली में रह रहा था, लेकिन दिल्ली में रहने के इंतजाम ऐसे होंगे। सपने में भी नहीं सोचा था। उस कमरे से बचने के लिए मैं ज्यादा से ज्यादा वक्त आईआईएमसी परिसर में ही बिताता। इस दौरान कई साथ के दोस्तों ने रुपए बचाने या तंगी के चलते हमारे साथ रहने की इच्छा जाहिर की। कपिल भी ऐसा चाहता था ताकि थोड़े रुपए बच सके, लेकिन मैंने ही छोटा रूम होने का हवाला देकर मना कर दिया। मेरी बात बहुत दिनों तक नहीं चली और करीब डेढ़ महीने के बाद गौतम भी हमारे साथ आकर रहने लगा। उस छोटे से कमरे में यह सबसे मुश्किल समय था। रूम हमेशा गंदा रहता। चाय के कप, मूंगफली के छिलके हमेशा कमरे में बिखरे रहते। बिस्तर जमीन पर ही लगता था। हफ्ते के सातों दिन उसपर एक पतली धूल की परत देखी और महसूस की जा सकती थी। कमरे पर होते तो स्वच्छ हवा और धूप को तरस जाते। इस दौरान मेरी तबीयत खराब हो गई। सांस की समस्या होने से मेरा वजन काफी गिर गया। काफी इलाज के बाद तबीयत ठीक हुई। हमने उस छोटे से रूम में बड़े संघर्ष किए। करीब चार महीने वहां रहने के बाद तीनों की हिम्मत ने जवाब दे दिया। सामूहिकरूप से नया रूम लेने का निर्णय लिया गया। पास ही दो रूम का फ्लैट मिल गया। उस समय (२००७-०८) फ्लैट का किराया ५२ सौ रुपए था। लाइट व पानी अलग से। यहां ये बताना इसलिए भी जरूरी है कि कई आईआईएमसी के छात्र आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे। अब भी अमूमन यही हाल होगा। उन परेशानी भरे दिनों को याद करता हूं तो दु:ख होता है। सबसे ज्यादा गुस्सा तो इस बात का है कि आज आईआईएमसी छोड़े करीब पांच साल हो गए हैं। इसबीच पता चला कि जो नया छात्रावास बना वो भी लड़कियों के लिए आरक्षित कर दिया गया। लड़कियों को मिल रही सुविधा से कोई बैर नहीं है, उन्हें रहने-खाने की सुविधा अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन परिसर में अभी तक लड़कों के लिए छात्रावास की व्यवस्था नहीं हो पाई है। यह शर्मनाक है! मैं अपील करता हूं कि मेरे सहपाठी व अभिन्न मित्र अभिषेक रंजनसिंह की मुहीम में हिस्सा लें। अपने संस्मरण लिखें और पोस्ट करें। हमें छात्रावास के लिए लडऩा होगा।
अरुण कुमार वर्मा
पूर्व छात्र, आईआईएमसी, नई दिल्ली
राजस्थान पत्रिका उदयपुर में कार्यर्त।
Wednesday, October 24, 2012
तेरी इस अदा पे •ुरबान,
ये जमीं, आसमां और वो जहां,
खुदा बस्ता है जहां,
और क्या वार दूं
इस मसूमियत पर,
तू बता...?
ये शोख, हसीनों से हंसी,
नशा तेरा,
आंखों से उतरता नहीं।
मंजनूं, फरहात, रांझा सा न सही,
पर मेरी मुहब्बत,
इन से •म भी नहीं।
ए• बार इ•रार •र लो तुम
भले दिल रखने •ो
तुम्हारी ए• 'हांÓ
भर देगी रंग •ोरे जीवन में
•ट जाएगी जिंदगी
फिर इस वहम में,
•ी उन•ो भी हम से प्यार था।
- अरुण वर्मा 'अश्•Ó
Saturday, October 13, 2012
ओ... नन्हीं परी,
खुशी •ा चिराग हो तुम,
सारे जहां •ी खुशियां ले•र आई हो।
अपनी ए• मुस्•ान भर से,
जीत लेती हो,
सारी थ•ान, गम-वो-दु:ख।
हमारे जीवन में तुम,
वरदान बन•र आई हो,
ए• झल• देख•र,
दिल में गुदगुदी सी होती है,
ममता हिलोरी लेती है।
तुम्हारे पास आने •ा जी •रता है,
रात दिन हम साथ खेलें,
ऐसा मन •रता है।
तुम्हारे साथ बिताए पल,
जीवन •ी अमोल निधि हैं।
तेरा खूब साथ मिले,
फिर से हम अपना 'बचपनÓ जीएं
ऐसा सोच •े मन पुल•ित है।
स्वस्थ रहो, निरोग रहो
ये 'मांÓमा दुआ •रता है।
...मेरी प्यारी भांजी •ो समर्पित।
अरुण वर्मा, सहाय• संपाद•, राजस्थान पत्रि•ा।
Sunday, May 13, 2012
मां
साबूत बना हूं।
मेरी सांस, दिल की धड़कन,
रंगो में खून की रवानी है,
तेरे वजूद से मेरी जिंदगानी है।
प्रसव की वेदना सह
मुझको, जहां में लाई हो,
मेरे लिए न जाने कितने,
कष्टों से पार पाई हो।
फिर भी ऊफ न कर,
नाजो से पाला है,
मेरी जरूरतों के लिए
अपने अरमानों का,
गला घोंट डाला है।
घर के कामकाज में उलझी,
खुद अस्त-व्यस्त रह,
हम को संभाला है।
हमको इंसान बनाने में,
अपने जीवन को खर्च डाला है।
कुछ मांगा नहीं,
बस देने की सूझी है।
अब, जब हूं मैं,
अपने पैरों पर,
कर नहीं पाता बहुत
फिर भी तू खुश है।
मां, तेरी सीख से,
रौशन मेरे अंधेरे हैं।
मुश्किल, हरपरेशानी बौनी लगती है,
पता है तेरी दुआ,
मेरे हौसलों में बसती है।
आज में जो कुछ हूं
बस तेरी दम पर हूं...।
मां, तुमसे बहुत प्यार करता हूं। मदर्स डे पर तुम्हारे लिए और दुनिया की हर मां के लिए।
अरुण वर्मा, सब एडिटर, राजस्थान पत्रिका, राजसमंद।
Friday, April 13, 2012
जुशत्जु
तेरा यकीन क्यों है?
जब खत्म होनी है बात,
तो दिल में खलिश क्यों है।
्रमंजिल-रास्ते,
जात-पात,
धन-दौलत,
रंग-ढग़ और शहूर,
सोचने-समझने,
हर अंदाज अलग,
फिर धड़कनों का साज,
एक क्यों है?
पता है,
ये मुमकिन नहीं,
फिर, ये भ्रम,
ये आस क्यों है।
खुद के सवाल,
खुद के जवाबों का,
सिलसिला अजब है।
खोने का डर,
पर हाथ कुछ नहीं है,
ये टीस,
ये दर्द,
यह ख्याल गजब है।
इस शय को कहते हैं,
प्यार अगर...
मौला का इकबार,
फिर से करम है।
सोचता हूं,
इस आरजू,
ख्याल को दफन कर दूं,
पर कैसे तेरी,
इबादत खत्म कर दूं...।
शादी
रिवाजों में बंधा,
पाक रिश्ता,
शादी का ये,
जहां, मिलते अनजाने दो,
एक-दूजे का हो जाने को।
जलसा,
अरमानों का सजता है,
अपनों का आशीष,
प्रेम बरसता है।
खुशी-गम,
मिलन-बिछोह के,
भावों में खो 'कुनबाÓ
एक, सूत्र में बंधता है।
चलता है दौर मनुहार का
मस्ती-धमाल होता है।
खुशियां चहकती हैं आंगन में
गीत-गानों से,
इजहार होता है।
हर तरफ,
मुस्कान सजी नजर आती है।
खुशी दिल की बड़ी,
धड़कनों से पता चल जाती है।
दो जिस्मों को एक जां
बनाने का जतन होता है।
अपने अरमानों को,
पूरा करने का यतन होता है।
चलता है बधाइयों का दौरा
खाने-पीने,
नाज-नखरों का दौर।
आखिर समय आता है,
दूल्हा-दूल्हन को,
एक अनजानी डगर पर छोड़,
दु:ख-सुख,
में साथ रहने का हौसला दे,
कारवां आगे बढ़ जाता है।
यहां खत्म रीत होती है,
प्रीत यहां से शुरू होती है,
युगल के साथ दो परिवार चलते हैं,
शायद,
समाज ऐसे ही बढ़ते और बढ़ते हैं.....
Wednesday, November 9, 2011
जिंदगी
ये जिंदगी, यू न कर खेल
नाजो से पले हैं हम
इतनी दुश्वारियां न सह पाएंगे।
तू ऐसे करेगी सितम अगर
बस... समझ ले, शीशे से टूट जाएंगे।
यहां जीने को जरूरी है दुनियादारी
तो ठीक है, पर हम यह न कर पाएंगे।
प्यार और नेकनियती कैसे छोड़ दें
बता दे तू इनको छोड़ेंगे तो न रह पाएंगे
मजबूर मत कर झूठा और मक्कार बनने पर
अगर, बन गए तो कभी शीशा न देख पाएंगे।
फिर तू भी गैर बन के पूछेगी सवाल
याद रख
जवाब, हम न दे पाएंगे।
Sunday, October 23, 2011
प्रवासी श्रमिकों का दर्द न जाने कोय!
पलायन- कार्यस्थल पर होता है
शोषण नेशनल सेम्पल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ-१९९९-२०००) द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डाले तो देश के कुल श्रमिकों में से ९२ प्रतिशत (३६।९ करोड़) मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। असंगठित क्षेत्र से तात्पर्य है उन श्रमिकों या मजदूरों से है जो रोजगार के अस्थायी स्वरूप, जानकारी के अभाव और निरक्षरता व छोटे तथा बिखरे व्यवसायों आदि कारकों से अपने हितों के लिए स्वयं संगठित नहीं हो पाए हैं। उपरोक्त आंकड़ों में एक बड़़ा तबका उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से देश के बड़े व मझोले शहरों में काम की तलाश में जाता है, जिनको हम प्रवासी श्रमिकों के तौर पर पहचानते हैं। राजस्थान से भी रोजी रोटी की तलाश में लाखों प्रवासी श्रमिक प्रदेश की सीमाओं को लांघ कर दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी व छोटे-मोटा व्यापार करते हैं।
प्रवासी श्रमिकों के बीच काम कर रही स्वयंसेवी संस्था 'आजीविका ब्यूरोÓ द्वारा हाल में किए गए सर्वे के आंकड़ों को माने तो दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल से करीब आठ लाख प्रवासी श्रमिक गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, राजकोट, वड़ोदरा व मुम्बई, हैदराबाद, बंगलौर, दिल्ली आदि शहरों में मजदूरी व छोटे-मोटे धंधे करते हैं। इन शहरों में काम करने वाले श्रमिक लाचारी व बेबसी की जिंदगी बसर करते हैं और उनको आए दिन शारीरिक, मानसिक व आर्थिक शोषण झेलना पड़ता है।
आजीविका ब्यूरो के शोध समन्वयक संतोष पूनिया ने बताया कि उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद के आदिवासी बहुल इलाकों से मीणा, भील, गरासिया व गमेती जातियों के पुरुष, महिलाएं व बच्चे गुजरात व महाराष्ट्र के शहरों में जाकर काम करते हैं। प्रवास का मुख्य कारण मौसमी बेरोजगारी, खेतीहर जमीन की कमी, कम कृषि उत्पादन, सिंचाई की कमी है। राजसमंद जिले में प्रवासी श्रमिकों की बेहतरी के लिए काम कर रहे स्वयंसेवी संस्था 'जतन संस्थानÓ के कार्यकारी निदेशक डॉ। कैलाश बृजवासी ने बताया कि खमनोर व कुम्भलगढ़ तहसील की प्रत्येक ग्राम पंचायत से ५०० से ५५० लोग जिले से बाहर काम की तलाश में प्रवास करते हैं, इनमें से अधिकतर भंगार कार्य, आइसक्रीम का ठेला, होटल व रेस्टोरेंट, घरेलू नौकर, कारखानों में कार्य, निर्माण कार्य, ड्राइवर, सिक्योरिटी गार्ड, दूग्ध कार्य व निजी संस्थानों में नौकरी करते हैं।
शहरों में श्रमिकों को कम मेहनताना, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, पहचान नहीं होने से पुलिस प्रताडऩा, तय समय से ज्यादा काम (१२ से १४) व यौन शोषण से भी जूझना पड़ता है। आमतौर पर नियोक्ता बाहर से आए प्रवासी श्रमिकों को कार्य पर लगाना पसंद करते हैं, इनसे अधिक घंटे काम लिया जाता है और उनको दी जाने वाली मजदूरी भी कभी-कभी निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से काफी कम होती है। वहीं श्रमिकों की निरक्षरता, जानकारी का अभाव व गरीबी का फायदा उठाकर बिचौलिए काम दिलाने में उनका शोषण करते हैं। असंगठित क्षेत्र में श्रम अधिनियमों के विस्तार का अभाव है, रोजगार का स्वरूप मौसमी व अस्थायी किस्म का है। श्रमिकों की गतिशीलता अधिक है। कार्यस्थल पर मनमाने ढंग से पारिश्रमिक तय किया जाता है, श्रम अनियमित किस्म का है। संगठनात्मक सहायता का अभाव व मोलभाव करने की श्रमिकों की क्षमता बहुत कम है।
संसाधनों की कमी, दक्षता व कुशलता न होना और अस्थायी व टिकाऊ नौकरी का अभाव जैसी कुछ अन्य समस्याएं भी इनकी दुर्दशा का कारण हैं। प्रवासी श्रमिकों के हक की रक्षा के लिए बनी सरकारी एजेंसियां महज खानापूर्ति करने में जुटी हैं। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित संभागीय श्रम कार्यालय में 'अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम-१९७९Ó के तहत कोई मामला दर्ज नहीं है, जबकि आदिवासी बहुल इलाके से लाखों की संख्या में लोग बाहर काम की तलाश में जाते हैं व कई कार्यस्थल पर दुर्घटना का शिकार हो विकलांग या बुरी तरह घायल हो चुके हैं। गुजरात के (बीटी कॉटन) कपास के खेतों में काम करते हुए बच्चों की मौतें तो अखबारों की सुर्खियों भी बनी हैं। इसके बावजूद संभागीय श्रम आयुक्त पताजंलि भू का कहना है कि ऐसे मामलों में मृतक के परिजन व नियोक्ता के बीच समझौता हो जाता हैं, हमारे यहां शिकायत नहीं आती, जिसके चलते हम कार्रवाई नहीं कर पाते।इधर अधिनियम में समान मजदूरी, राजनैतिक व सामाजिक अधिकारों की रक्षा, बच्चों की शिक्षा, काम का अधिकार, रोजगार सुरक्षा, कार्यस्थल पर सुरक्षा, दुर्घटना लाभ, विधिक सहायता, दुर्घटना की स्थिति में क्षतिपूर्ति, रिटायरमेंट लाभ आदि के प्रावधान है, लेकिन सक्षम एजेंसी के अभाव में इन नियमों से प्रवासी श्रमिकों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।हालांकि कुछ स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं ने प्रवासी श्रमिकों की मुश्किलों को हल करने के लिए पहचान कार्ड व उनके पंजीकरण का काम शुरू किया है, कौशल विकास व वित्तीय सेवाओं से जोडऩे के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर उनको सक्षम बनाया है। एनजीओ की इस पहल से प्रवासी श्रमिकों की स्थितियों में सकरात्मक परिवर्तन हुए हैं। वहीं एडवोकेसी के चलते सरकार भी निर्माण व प्रवासी श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लेकर आई है। हाल में ही राजस्थान व गुजरात सरकार द्वारा मिलकर गुजरात बाल श्रम व ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोकने के लिए संयुक्त प्रयासों के तहत बनाई गई टॉस्क फोर्स व लेबर हेल्प लाइन इसका उदाहरण हैं, लेकिन अब भी सरकार व स्वयंसेवी संस्थाओं से ऐसे ही और सकारात्मक प्रयासों की दरकार है, जिससे प्रवासी श्रमिकों को शोषण से पूर्णतय: मुक्त कराया जा सके।
साथ ही आदिवासी अंचल के लोगों को अपने जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, पाली व नागौर (मारवाड़ क्षेत्र) के भाइयों से सीख लेनी होगी, जिन्होंने लाखों मुश्किलों व शोषण के बाद भी उद्यमिता के दम पर उपरोक्त शहरों में अपने बड़े-बड़े कारोबार स्थापित किए हैं और मारवाड़ी मानुष का नाम रोशन कर हजारों लोगों के रोजगार का जरिया बने हैं।
----अरुण कुमार वर्मा पूर्व छात्र, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
अस्थायी पता- श्रीनाथ मार्केट, चौपाटी, कांकरोली, राजसमंद
राजस्थानफोन नम्बर- ०९००१७७८०६३
Tuesday, September 27, 2011
अंशू
आंखों से बहते इस बेरंग पानी में
कभी दुःखों का स्याह,
कभी खुषी का धानी रंग बहता है।
ये मोती कह देते हैं दिल की बात,
ऐसे जैसे, कोई रहबर तेरे दिल की बात करता है।
और,सारे जमाने की किस्मत लेकर आया है वो तकिया
जो तेरे नयनों से निकले जज्बातों को जप्त करता है।
Sunday, September 25, 2011
राजस्थान में बेटियों को पैदा होने का हक क्यों नहीं ?

घटता बाल लिंगानुपात - दुःखद सच
सन् 2011की जनगणना ने एक बार पुनः सभी को चौंका दिया है। प्रति 10 वर्ष में घोषित जनगणना के आंकड़ों से निरन्तर गायब होती जा रही बेटियों की संख्या से सभी शर्मसार हुए हैं। इस दृष्टि से भारत का बाल लिंगानुपात ( 0-6 वर्ष तक की आयु वर्ग में प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या ) में सन् 2001 के 927 की तुलना में सन् 2011 के 914 के आंकडो़ में 13 के अंतर को स्पष्ट देखा जा सकता है। दूसरी ओर हमारे राज्य राजस्थान में यह अन्तर - 26 का हो गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में 0-6 वर्ष आयु वर्ग में प्रति 1000 लड़कों पर मात्र 883 लड़कियां रह गई हैं। लड़कियों की संख्या में आ रही भारी गिरावट के कारण हमारे राज्य की लगभग 7 लााख लड़कियां गायब हैं। राजसमंद जिले में (जहां पिछली जनगणना सन् 2001 में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या भी 1000 थी और जिसे जिले के लिए गर्व का सूचक माना जाता था) बाल लिंगानुपात के आंकडो में आए - 45 के अन्तर ने जहां एक ओर हम सभी को हिलाकर रख दिया। वहीं दूसरी ओर सरकारी व गैर सरकारी व अन्य संगठनों द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर सवाल खड़ा कर दिया है। राजसमंद में सन् 2001 में बाल लिंगानुपात 936 था जो कि सन् 2011 में घटकर 891 रह गया है। जिले की जनसंख्या में से 10026 बेटियां गायब है। जबकी सन् 1991 में अलग जिले के रुप के अस्तित्व मेें आने के बाद पिछले 20 वर्षो में राजसंमद में साक्षरता के साथ - साथ संसाधन और जानकारी भी बढ़ी है। राज्य के डूंगरपुर, जयपुर, सीकर, टोंक, झुंझनू, अलवर, दौसा, भरतपुर करौली और सवाई माधोपुर जिले में भी बाल लिंगानुपात तेजी से घटा है। बेटियों की निरन्तर घटती जनसंख्या इस बात की ओर संकेत देती है कि राज्य में पी.सी.पी.एन.डी.टी. कानून के सही क्रियान्वयन में कमी है। सरकार, स्ंवयसेवी संस्थाओं और प्रशासन द्वारा किए जा रहे प्रयास काफी नहीं है। राज्य में अनचाही लड़कीयों को अस्वीकार करने के लिए प्रयोग की जा रही अल्ट्रा साउण्ड तकनीक का प्रयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। यह जानकरी तब प्रकाश में आई जब सन् 2006 में एक नीजी चैनल द्वारा करवाए गए स्ट्रींग ऑपरेशन से राज्य के 22 जिलों में 100 से भी अधिक चिकित्सकों को पकड़ा गया था। इसके बाद राजस्थान मेंडीकल कांउसंिलंग द्वारा की गई कार्यवाही के बावजूद राज्य में सोनोग्राफी मशीनांे का प्रयोग बदस्तूर जारी है। राज्य के लोग पडो़सी राज्यों में जाकर गर्भ में पल रहे शिशु की लिंगजांच का काम धड़ल्ले से करवा लेते हैं और यह पता चलने पर कि गर्भ में लड़की है, गर्भपात करवा देते हैं। इसी विषय पर काम कर रही स्वयं सेवी संस्था सीफार द्वारा 13 जिलों में विभिन्न संस्थाओ और संगठनों के साथ किए जा रहे कार्य के दौरान स्पष्ट हुआ कि राज्य में 1651 नीजी क्लिनीक एंव 122 सरकारी अस्पताल अल्ट्रा साउण्ड केन्द्र के रुप में पंजीकृत हैं। 1000 से अधिक पंजीकृत नीजी क्लिनिकों में लिंग जांच का काम धड़ल्ले से जारी है। (सीफार - 2010) लड़का पैदा होने की इच्छा, लड़कियांे के जन्म पर खुश न होने की परम्परा, दहेज प्रथा , बाल विवाह और छोटी आयु में गर्भधारण करना और महिलाओं की षिक्षा में कमी जैसे महत्वपूर्ण कारण इस सामाजिक असमानता के प्रति जिम्मेदार हैं।सवाल मानसिकता में बदलाव का है और बेटियों की गरिमा को पुर्नस्थापित करने का है। पी.सी.पी.एन.डी.टी एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी को आगे आना होगा। इसके लिए व्यापक प्रसार-प्रचार की जरुरत है। इसे जन - जन का मुद्द्ा बनाया जाना जरुरी है। आम जनों को भी इस जानकारी से परिचित होना आवश्यक है कि गर्भ में पल रहे शिशु की लिंग जांच करवाना कानूनन अपराध है और इसके लिए सजा का प्रावधान है। दूसरी ओर बेटियों की महत्ता को बढाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए। जन्मोत्सव के साथ ही उसके समुचित पालन - पोषण , शिक्षा व सम्मान का सुनिश्चितकरण समाज में उनकी गरिमा को बढाने में सहायक होगा। अन्त में खास सबक उन जिलों से भी ले जहां विगत 10 वर्षों की जनगणना में बाल लिंगानुपात पहले की अपेक्षा बढा है, जैसे श्रीगंगानगर। वहां की सफल प्रेक्टिसिस का पता लगाकर यह जाना जा सकता है कि किस तरह से उन्होने यह संभव कर दिखाया। इसके लिए आम व्यक्ति द्वारा ली जाने वाली जिम्मेदारी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
Saturday, September 3, 2011
मेरा दोस्त है मेरी दुवाओं में...
बात अब की नहीं, थोड़ी पुरानी है
लम्हा-लम्हा कटती जिंदगी में यादों की रवानी है।
१२वीं पास कर, दिल में कुछ सपना लिए
पड़ गए चकर में कालेज में प्रवेश के
तिकड़म करे और सहे हमने
आखिर लगी कश्ती, यूनिवर्सिटी के किनारे पर
नया माहौल, आशा और उमंगे थीं
पढ़ाई से कुछ खास मतलब न था
फिर एक दिन अचानक!
क्लास के बाहर वह औपचारिक मुलाकात,
पता नहीं क्यूं?
उसके नेक ख्याल, हमदर्दी
खूब पढ़ाई, मस्ती भी करी
काम की सिलसिले में,
aभी हाल में वह
haal me ले कर आया,
उसने मुझे अपनी शादी में बुलाया,
एक खुशी के बाद
Thursday, May 19, 2011
श्रम विभाग के पास अटका मजदूरों का न्याय

Sunday, March 27, 2011
Monday, August 23, 2010
तुम बिन सूनी राखी
याद कर खुश हो लेता हूँ
वो पुराने दिन
जब तुम राखी के दिन जल्दी तैयार हो जाती।
हम को नीद से जगा कर कहती
जल्दी तैयार हो जावो, हम तैयार होते।
तुम जल्दी से थाली लातीं।
हल्दी और चावल का टिका लगती।
दूब की पंखुड़ियों को कानो पर साजती।
माँ के आँचल सा रुमाल सर पे डालती .
सूनी कलाई पर राखी सजाती ...
रुपयों के लिए तेरे झगड़े
sarart se से मिठाई मुंह में tushna.
hansi majak wo masti yaad aati hai।
अब हर राखी उन बिताये सुनहरे पालो की
याद भर लाती है...
तेरी कागज में लिपटी राखी
tujse दुरी का अह्शाश करती है....
Tuesday, May 4, 2010
Thursday, January 14, 2010
अंकुर तुम याद आए
मालूम है मुझे
मैने की ज्यादती तुम पर
मारा पीटा, तुमको दुख दिया
मालूम नहीं था
तुम इतने कम समय के लिए साथ हो
ऐसे छोड कर एक दिन अचानक चले जाओगे।
बहुत याद आती है तुम्हारी
एक बार कहीं मिल जावो
तो मैं बता सकूं।
कितना चाहता हूं तुमको
तुम्हारी आंखों से निकले आंसू
आज तक मेरी आंखों से बहते हैं।
सोचता हूं काश मैं इतना क्रू नहीं होता
काश मुझे पता होता
तुमारे पास समय कम था।
मैने जो किया है।
उसके लिए अपने आप को ताउम्र माफ नहीं कर सकूंगा।
बस एक बार आ कर कह दो
ददा कोई बात नहीं
बस एक बार आकर
फिर गले से लग जावो
फिर से हम पंतग उडाएं
कंचे खेले, ताश खेले
नाचे, गाए एक्टिंग करें।
भाई तुम को बहुत मिस करता हूं।
इतनी दूर क्यों चले गए
की तुम्हारे पास आना मुमकिन नहीं है।
काश तुम से मिल पाता
तुम से माफी मांग पाता
तुम्हें बता पाता की
तुम से कितना प्यार करता हूं।
Sunday, August 9, 2009
पापा
अपने पैरों पर चलना
आवाज पर जुबां फेर बोलना
तारों में दादी को ढूढना
कहानियों में खुद को तलाशन।
नन्हें हाथों में कलम तुमने थमाई
क ख ग, ए बी सी डी से मिलवाया
कैसे अक्षरों से शब्द बनाएं
कैसे पढें और पढाएं।
तुमसे से सीखा सच बोलना
ईमानदारी का सबक
मेहनती लोगों का यश होता है,
ये आपने हमको बताया।
याद है मुझे आप की डांट
शैतानी पर पडी मार
अच्छे काम पर गले से लगाना
पुच्कारना और प्यार जताना।
हमारे भविष्य को लेकर
आप का त्याग
अपनी इच्छाओं का दमन
दो पैंट शर्ट के जोंडों,
एक जोडी चप्पलों में साल काटना।
शब्दों में मुश्किल है, पापा
तुमको लिखना,
तुम्हारे संघर्षों को, मुश्किलों को समझना
तुम प्यार व सादगी का अथाह सागर हो
मेहनत का पर्याय तुम्हारा जीवन है।
तुम्हारा अंश हूं
तुमसा बनना चाहता हूं।
बस आप जैसी ही मेरी पहचान बने
ये आशीश चाहता हूं।
आप दीर्घ आयु हों, निरोग रहें
भगवान से मेरी प्रार्थना है।


