Wednesday, March 18, 2009

सुबह कितनी शुहानी


कल कई सालों के बाद
सुबह जल्दी उठ गया
उगता सूरज देख कर
मन खिल गया।

चिडियों के कलरव
पवन के शीत झोंको
बेफिक्र उड़ते पंछियों ने

मन्दिर की घंटी
दूध वाले के पों पों
बच्चों की खिलखिलाहट ने

उनकी अलसाई अंगडाई
माँ के अवधी गीतों
अखबार की खबरों ने

जी को तरोताजा कर दिया.

Saturday, January 3, 2009

अनजान राहों में




अनजान राहों में फिर से तनहा

चलता जा रहा हूँ, बिन मंजिल के

तुम मिली तो इक पल को लगा

अब भटकना नही पड़ेगा।

लेकिन ये सपना भी टूट गया।

जिन्दगी का इक नया सबक

चुपके से तुमने सिखा दिया

पाने-खोने का सुख और दुःख

जीते और लड़ते रहने का

आगे ही आगे बड़ते रहने का

इक नया पथ दिखला दिया।

Saturday, November 8, 2008

इंतजार

इंतजार भी क्या लफ्ज है
हर इन्सान की जिन्दगी में शामिल है

इंतजार है कामयाबी का
इंतजार है दौलत-सोहरत का
इंतजार है अपनों का
इंतजार है प्यार का
इंतजार है खुशियों का

इंतजार में एक-एक पल सदियों सा लगता है
इंतजार में लोग एक पल में एक सदी जीतें है

कभी इंतजार खुशी है
तो कभी बेइन्तहां गम
इंतजार तड़प है
मीठा दर्द है, नाराजगी है, मुहब्बत है।

इंतजार सिर्फ़ उसका
जिसे हम दिलोजान से चाहते है
मुझको भी है इंतजार उसका
देखते है उसको कब.........

Thursday, October 30, 2008

क्यूं ये पागलपन है

नही मालूम क्या हुआ है मुझे
हर बार की तरह
फिर भावानाओं ने बाहुपास में जकडा है
मालूम है फिर से तड़प, आंशू और जुदाई होगी
लेकिन दिल है कि सुनने को तैयार नही।

सोचता हूं, मौला ने कर्म फरमाया है या सजा दी है
सब कि तरह मुझ को भी बनाया होता
लोगो से केसे काम निकलना है सिखलाया होता
मुझे में वो सारी बुराई डालता
जो जमाने में जिंदा रहने को जरुरी है।
मुझको भी खुदगर्ज और मौकापरस्त बनाया होता।

मुझको भी सिखलाता थोडी दुनियादारी,
चापलूसी और मक्कारी
ममता, प्यार और नेकनीयती न दी होती।
आँखों में आंशू देता लेकिन मगरमछी

मेरे मौला बड़ी मुश्किल से जी रहा हूं
अपनी इस सराफत पे कुढ़ रहा हूं
मेरे मालिक मुझ को भी शैतान बना
ताकि जिन्दगी के बचे दिन
चैन से काट सकूं..............

Wednesday, October 22, 2008

अजब सा हाल

जब से उससे मिला हूं
अजब सा हाल है
वो करीब होती है
तो दिल घबराता है
वो दूर होती है
तो चैन नही आता है
उसका ही चेहरा
सोती आँखों में
उसकी छुवन
महसूस होती है हर पल
उसकी मुस्कान
क्यों इतनी दिलकश लगती है
क्यों सिर्फ़ उसको सोचता हूं.....

Monday, October 6, 2008

दुल्हन बनेगी मेरी गुडिया

दुल्हन बनेगी मेरी गुडिया
पता नही कब बड़ी हो गई.

जैसे अभी कल ही की बात हो

जब हम दोनों गुड्डे गुडियों के खेल खेलते थे
साइकल की सवारी करते
स्कूल जाते, लडाई करते।
वो पढ़ती मै न पढने के बहाने करता
मै पिटता तो, तो उसकी सरारत समझता।

उसकी हाथो में लगी मेहंदी ने
बचपन की सारी यादों को रंग दिया
मेरी आँखों को तरल कर दिया

जानता हूं अब वो दौर खत्म हो गया

अब नए रिश्ते होंगे नई बात होगी
जीवन की नई, अलबेली शुरुवात होगी
इक नई और अनजानी डगर पर
वो अपने जीवन साथी के साथ होगी ।


लेकिन माँ की तरह भाई का दिल भी
ममता से सराबोर है घबराता है, पुलकित है
हर्षित है थोड़ा रुवासा भी है।

पता है ममता ये ज्वार उठाती......


Saturday, September 27, 2008

हिंदू या मुस्लिम



हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये

अपनी कूर्सी के लिए जज्बात को मत छेडिये

हममें कोई हुण, कोई शक, कोई मंगोल है

दफ़न है जो बात उस बात को मत छेडिये

गर गलतियां बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जले

एसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेडिये

है कहां हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खां

मिट गए सब कौम की औकात को मत छेडिये


छेडिये इक जंग, मिलजुल कर गरीबी के खिलाफ


दोस्त, मेरे मजहबी नगमात को मत छेडिये।


अदम गोंडवी