Thursday, August 28, 2008

अकेला हूँ

अकेला हूँ अपनों के बीच में

अपने लगते है पराये से

कमी कुछ नही है जीवन में

पर क्यों लगता है कुछ नही है पास में

जीत लेने को है अनंत आकाश

बाहें फैलाय कामयाबी बुलाती है

पर नही बड़ते कदम उसका आलिंगन करने को

सोचता हूँ ये कामयाबी क्या देगी मुझे

समाज में नाम, परिवार और प्रतिष्ठा

इक बनावाटी जिन्दगी, इक झूटी शान

नही चाहिए ये दायरे की जिंदगी

जिसमे सब बन्धनों में बंधा हो

जिसमे हर तरफ लक्ष्मन रेखा हो..........

3 comments:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन..


थोड़ा टाईपो हो रही है-शायद गलत की स्ट्रोक के कारण. देखियेगा.

seema gupta said...

अकेला हूँ अपनों के बीच में
अपने लगते है पराये से
कमी कुछ नही है जीवन में
पर क्यों लगता है कुछ नही है पास में
"nice to read, well said beautiful thoughts"

Regards

PREETI BARTHWAL said...

बेहतरीन सुन्दर